मलयालम सिनेमा के दिग्गज अभिनेता मोहनलाल को दुनिया एक शानदार कलाकार, सुपरस्टार और नेशनल अवॉर्ड विजेता के रूप में जानती है। लेकिन इन तमाम उपलब्धियों के पीछे जो रिश्ता सबसे मजबूत और सबसे भावनात्मक रहा, वह था उनकी मां शांताकुमारी के साथ।
भले ही मोहनलाल खुद को अक्सर एक “डिटैच्ड पर्सन” बताते रहे हों, जो सफलता और असफलता से ज्यादा प्रभावित नहीं होता, लेकिन केरल और दुनिया भर के मलयाली फैंस यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि वह अपनी मां से बेहद जुड़े हुए थे।
मां, जो बेटे का दर्द पर्दे पर भी नहीं देख सकीं
शांताकुमारी का अपने बेटे मोहनलाल के लिए प्यार इतना गहरा था कि वह उनकी कुछ सबसे मशहूर और प्रशंसित फिल्मों को कभी पूरा देख ही नहीं पाईं। वजह थी – उन फिल्मों में मोहनलाल का दर्द, संघर्ष और पीड़ा।
उन्होंने खुद एक टीवी इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि वह मोहनलाल की त्रासदी से भरी फिल्मों को देखने का साहस नहीं जुटा पाती थीं।
“मैं Kireedam या Chenkol नहीं देख सकती। वह बहुत दर्दनाक हैं। उनमें मारपीट और तकलीफ है। मैंने Chenkol तो बिल्कुल नहीं देखी। Kireedam थोड़ा देखा और फिर बंद कर दिया। Thalavattam भी नहीं देखी और देखना भी नहीं चाहती।”
एक मां के लिए यह सिर्फ अभिनय नहीं था, बल्कि अपने बेटे को दुख में देखने जैसा था।
Kireedam, Chenkol और Thalavattam: क्लासिक लेकिन असहनीय
Kireedam (1989), Chenkol (1993) और Thalavattam (1986) – ये तीनों फिल्में आज मलयालम सिनेमा की क्लासिक कृतियों में गिनी जाती हैं।
इन फिल्मों में मोहनलाल ने ऐसे किरदार निभाए, जो व्यवस्था, हालात और किस्मत से हारते नजर आते हैं।
Kireedam में एक होनहार युवक का अपराध की दुनिया में फंस जाना
Chenkol में समाज द्वारा बार-बार ठुकराया गया इंसान
Thalavattam में मानसिक पीड़ा से जूझता किरदार
जहां दर्शकों ने इन फिल्मों में मोहनलाल के अभिनय को सिर-आंखों पर बैठाया, वहीं एक मां के लिए यह सब असहनीय दर्द था।
ब्लॉकबस्टर Chithram का क्लाइमैक्स भी नहीं देख पाईं
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शांताकुमारी ने मोहनलाल की सुपरहिट फिल्म Chithram (1988) का क्लाइमैक्स तक नहीं देखा।
Chithram, मोहनलाल के करियर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक मानी जाती है। फिल्म की कहानी हल्के-फुल्के अंदाज में आगे बढ़ती है, लेकिन अंत बेहद भावनात्मक हो जाता है।
शांताकुमारी ने बताया था कि वह फिल्म का आखिरी हिस्सा नहीं देख सकीं और थिएटर से बाहर निकल गईं, क्योंकि उन्हें लगा कि वह उस भावनात्मक दर्द को झेल नहीं पाएंगी।
मां को पसंद थीं मोहनलाल की हल्की-फुल्की फिल्में
जहां एक तरफ वह बेटे की दुखभरी कहानियों से दूर रहती थीं, वहीं दूसरी तरफ शांताकुमारी को मोहनलाल की कॉमेडी और हल्की-फुल्की फिल्में बेहद पसंद थीं।
उन्होंने खासतौर पर Kilukkam (1991) जैसी फिल्मों का जिक्र किया, जिनमें मोहनलाल का चुलबुला और हंसमुख अंदाज देखने को मिलता है।
एक मां के लिए बेटे को हंसते-मुस्कुराते देखना ही सबसे बड़ा सुकून था।
मोहनलाल और मां का अटूट रिश्ता
मोहनलाल चाहे कितने ही व्यस्त क्यों न हों, वह अपनी मां के लिए हमेशा समय निकालते थे।
उनके करीबी बताते हैं कि:
वह नियमित रूप से मां से फोन पर बात करते थे
जरूरत पड़ते ही शूटिंग छोड़कर उनके पास पहुंच जाते थे
हर बड़ी खुशी सबसे पहले मां के साथ साझा करते थे
इस रिश्ते की सबसे भावनात्मक तस्वीर तब देखने को मिली, जब दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड जीतने के बाद मोहनलाल सबसे पहले कोच्चि लौटकर अपनी बीमार मां से मिलने गए और उनके साथ यह खुशी साझा की।
90 साल की उम्र में हुआ शांताकुमारी का निधन
30 दिसंबर को शांताकुमारी का 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके जाने से न सिर्फ मोहनलाल, बल्कि पूरा मलयालम फिल्म जगत भावुक हो उठा।
उनके लिए मोहनलाल सिर्फ एक सुपरस्टार नहीं, बल्कि हमेशा “लालू” ही रहे – वही बेटा, जिसकी तकलीफ वह पर्दे पर भी नहीं देख पाती थीं।
SamaypeNews View
यह कहानी सिर्फ एक अभिनेता और उसकी मां की नहीं है, बल्कि हर उस मां की है, जो अपने बच्चे को दुख में देखना सहन नहीं कर सकती – चाहे वह दुख असल जिंदगी का हो या फिल्मी पर्दे का।
मोहनलाल की कुछ सबसे महान फिल्मों को उनकी मां का न देख पाना, यह साबित करता है कि मां का प्यार अभिनय और सिनेमा से कहीं ऊपर होता है।


