RBI की नीति से पहले बाजार की बड़ी मांग – ब्याज दर नहीं, तरलता जरूरी
भारतीय बैंकिंग सिस्टम इस समय जिस सबसे बड़ी समस्या से जूझ रहा है, वह है तरलता (Liquidity) की कमी। RBI की अगली मौद्रिक नीति बैठक से पहले अर्थशास्त्रियों, बैंकों और बाजार से जुड़े विशेषज्ञों की एक राय बनती दिख रही है –
“ब्याज दरों को छेड़ने की जरूरत नहीं, बल्कि सिस्टम में नकदी डालना ज्यादा जरूरी है।”
SamaypeNews की पड़ताल में सामने आया है कि RBI से बाजार अब ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) और करेंसी स्वैप जैसे टूल्स के जरिए बैंकिंग सिस्टम में पैसा डालने की अपील कर रहा है।
आखिर बैंकिंग सिस्टम में नकदी की कमी क्यों?
इस समय भारतीय बैंकिंग सिस्टम पर तीन तरफ से दबाव है:
RBI का फॉरेक्स इंटरवेंशन
रुपये की तेज गिरावट को रोकने के लिए RBI लगातार डॉलर बेच रहा है। जब RBI डॉलर बेचता है, तो वह बाजार से रुपये खींच लेता है – जिससे सिस्टम में नकदी घट जाती है।
तेज क्रेडिट ग्रोथ
बैंकों से कर्ज लेने वालों की संख्या बढ़ रही है। कंपनियां और आम लोग अधिक लोन ले रहे हैं, जिससे बैंक की नकदी तेजी से बाहर जा रही है।
एडवांस टैक्स का दबाव
जनवरी और मार्च जैसे महीनों में कंपनियां सरकार को एडवांस टैक्स जमा करती हैं। इससे भी बैंकिंग सिस्टम से बड़ी मात्रा में पैसा निकल जाता है।
इन तीनों कारणों ने मिलकर लिक्विडिटी को टाइट बना दिया है।
बाजार और अर्थशास्त्रियों की एक आवाज
RBI के साथ हुई प्री-पॉलिसी मीटिंग में बाजार से जुड़े लोगों ने साफ शब्दों में कहा:
“इंटरेस्ट रेट कट अभी जरूरी नहीं, बल्कि बैंकों के पास पैसा पहुंचाना जरूरी है।”
उनका मानना है कि:
महंगाई कंट्रोल में है
आर्थिक विकास स्थिर है
इसलिए मौद्रिक नीति में बड़ी कटौती की जरूरत नहीं है
लेकिन अगर बैंकों के पास पैसा ही नहीं होगा, तो:
लोन महंगे होंगे और ग्रोथ पर असर पड़ेगा।
RBI के पास कौन से हथियार हैं?
RBI के पास तरलता बढ़ाने के लिए दो बड़े टूल हैं:
1. ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO)
इसमें RBI सरकारी बॉन्ड खरीदता है।
जब RBI बॉन्ड खरीदता है तो:
वह बाजार में नया पैसा डाल देता है
इससे बैंकों के पास नकदी बढ़ जाती है और वे आसानी से लोन दे पाते हैं।
2. करेंसी स्वैप
करेंसी स्वैप में RBI डॉलर लेकर बदले में रुपये देता है।
यह भी बाजार में रुपये की सप्लाई बढ़ाने का तरीका है।
इससे:
रुपये पर दबाव भी कम होता है
और बैंकिंग सिस्टम में तरलता भी बढ़ती है
ब्याज दर क्यों नहीं घटाना चाहता बाजार?
बहुत से लोग सोचते हैं कि ब्याज दर कम करने से बाजार को राहत मिलती है। लेकिन इस समय स्थिति अलग है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार:
महंगाई काबू में है
विकास दर ठीक है
ब्याज दरों में कटौती से रुपये पर दबाव बढ़ सकता है
अगर RBI दरें घटाता है, तो विदेशी निवेशक पैसा निकाल सकते हैं, जिससे रुपया और कमजोर होगा।
इसलिए विशेषज्ञ कहते हैं:
अभी दरों से छेड़छाड़ न करें, बल्कि नकदी डालें।
रुपया और लिक्विडिटी का गहरा रिश्ता
RBI जब भी रुपये को गिरने से बचाने के लिए डॉलर बेचता है, तो:
भारतीय बाजार से रुपये निकल जाते हैं
इससे:
ब्याज दरें ऊपर जाती हैं
बैंकों को पैसा महंगा मिलता है
और शेयर बाजार भी दबाव में आता है
यही वजह है कि बाजार RBI से चाहता है कि:
फॉरेक्स इंटरवेंशन के साथ-साथ नकदी की भरपाई भी की जाए।
बैंकों पर क्या असर पड़ रहा है?
तरलता की कमी का सीधा असर बैंकों पर दिख रहा है:
बैंक आपस में महंगे ब्याज पर पैसा उधार ले रहे हैं
लोन की दरें ऊपर जाने का खतरा
क्रेडिट ग्रोथ धीमी पड़ सकती है
अगर यह स्थिति बनी रही तो:
रियल एस्टेट, ऑटो और MSME सेक्टर पर असर पड़ सकता है।
आगे RBI क्या कर सकता है?
SamaypeNews के सूत्रों के मुताबिक RBI:
सीमित OMO
और छोटे स्तर पर करेंसी स्वैप
का इस्तेमाल कर सकता है।
इससे:
बैंकिंग सिस्टम को धीरे-धीरे राहत मिलेगी और रुपये पर भी नियंत्रण रहेगा।
SamaypeNews का विश्लेषण
इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती महंगाई या ग्रोथ नहीं, बल्कि तरलता का संतुलन है।
RBI अगर समय रहते बाजार में नकदी डाल देता है, तो:
बैंक मजबूत होंगे
शेयर बाजार स्थिर रहेगा
और रुपये पर दबाव कम होगा
यही वजह है कि पूरा बाजार एक सुर में कह रहा है –
“दरें बाद में, पहले सिस्टम में पैसा डालो।”


