NSE IPO पर राहत: दिल्ली हाईकोर्ट ने सेबी की मंज़ूरी को चुनौती देने वाली याचिका की खारिज

क्षेत्राधिकार की दीवार से टकराई याचिका, NSE IPO को मिली कानूनी राहत

Dev
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NSE IPO को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका खारिजNSE IPO, SEBI News

नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज National Stock Exchange (NSE) के बहुप्रतीक्षित प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) को लेकर बड़ी कानूनी राहत सामने आई है। Delhi High Court ने सोमवार को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड Securities and Exchange Board of India (SEBI) द्वारा दी गई मंज़ूरी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।

यह फैसला NSE की लिस्टिंग की दिशा में एक अहम बाधा को हटाता है, जिसे लेकर बाजार लंबे समय से इंतजार कर रहा था।

क्षेत्राधिकार बना याचिका खारिज होने की वजह

दिल्ली हाईकोर्ट की सिंगल बेंच, जिसकी अध्यक्षता Justice Jasmeet Singh ने की, ने याचिका को सुनवाई योग्य मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं बनता।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
“यह अदालत इस याचिका पर विचार करने का क्षेत्राधिकार नहीं रखती। IPO के लिए नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) मुंबई में दिया गया है, ऐसे में यह याचिका यहां विचारणीय नहीं है।”

इस टिप्पणी के साथ अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।

किसने दायर की थी याचिका?

यह याचिका 72 वर्षीय पूर्व न्यायिक अधिकारी के.सी. अग्रवाल द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने सेबी द्वारा 30 जनवरी को NSE को दी गई IPO मंज़ूरी को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि NSE ने डेरिवेटिव ट्रेडिंग से जुड़े कॉरपोरेट एक्शन एडजस्टमेंट (CAA) नियमों का उल्लंघन किया है।

अग्रवाल का कहना था कि इन कथित उल्लंघनों की सही तरीके से जांच किए बिना सेबी ने NSE को IPO की अनुमति दे दी।

क्या है कॉरपोरेट एक्शन एडजस्टमेंट (CAA)?

CAA एक ऐसा ढांचा है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जब कोई सूचीबद्ध कंपनी बोनस शेयर, स्टॉक स्प्लिट या असाधारण डिविडेंड जैसे कॉरपोरेट एक्शन लेती है, तो डेरिवेटिव ट्रेडर्स को न तो अनुचित लाभ हो और न ही नुकसान।

इस व्यवस्था के तहत फ्यूचर्स और ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स में वैल्यू न्यूट्रैलिटी बनाए रखने के लिए जरूरी तकनीकी समायोजन किए जाते हैं।

याचिकाकर्ता के आरोप क्या थे?

के.सी. अग्रवाल ने आरोप लगाया कि NSE ने CAA फ्रेमवर्क के तहत कीमत (Price) में तो बदलाव किया, लेकिन मात्रा (Quantity) में आवश्यक समायोजन नहीं किया। इसके बजाय, डिविडेंड के बराबर राशि सीधे डेरिवेटिव ट्रेडर्स के खातों से डेबिट कर दी गई।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि Securities Contracts (Regulation) Act के अनुसार डिविडेंड पर अधिकार केवल शेयरधारकों का होता है, न कि डेरिवेटिव ट्रेडर्स का।

सेबी पर भी लगाए गए सवाल

अग्रवाल का आरोप था कि उनकी शिकायतों को बिना उचित सुनवाई के बंद कर दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि सेबी ने NSE के फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा नहीं की और एक्सचेंज के रुख को ही सही मान लिया।

इतना ही नहीं, याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि सूचना का अधिकार (RTI) के तहत डेरिवेटिव ट्रेडर्स से डेबिट की गई राशि से जुड़ी जानकारी मांगी गई, लेकिन उसे भी खारिज कर दिया गया, जिससे “सूचना का शून्य” पैदा हुआ।

IPO रोकने की मांग

याचिका में मांग की गई थी कि जब तक पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हो जाती, तब तक सेबी को NSE को IPO लाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

सेबी और NSE का पक्ष

सुनवाई के दौरान NSE और सेबी की ओर से अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता का इस मामले में locus standi नहीं बनता। साथ ही यह भी दलील दी गई कि यह याचिका IPO प्रक्रिया को जानबूझकर बाधित करने की कोशिश है, जबकि इसमें करीब 8.5 लाख से अधिक निवेशकों के हित जुड़े हुए हैं।

दोनों संस्थाओं ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता पहले भी अलग-अलग मंचों पर इसी तरह की कई याचिकाएं दायर कर चुके हैं।

NSE IPO का लंबा इंतजार

NSE का IPO भारतीय पूंजी बाजार के सबसे लंबे समय से अटके और बहुप्रतीक्षित पब्लिक इश्यूज़ में से एक रहा है। एक्सचेंज ने पहली बार 2016 में ड्राफ्ट पेपर्स दाखिल किए थे, लेकिन उसके बाद रेगुलेटरी जांच, गवर्नेंस से जुड़े सवाल और चर्चित को-लोकेशन केस के चलते लिस्टिंग प्रक्रिया रुक गई।

तकनीकी सिस्टम, अनुपालन प्रक्रियाओं और आंतरिक नियंत्रण को लेकर भी कई सवाल उठे, जिससे सेबी की मंज़ूरी मिलने में वर्षों लग गए।

जनवरी 2026 में मिली सेबी की NOC

कई दौर की समीक्षा और सुधारात्मक कदमों के बाद, सेबी ने जनवरी 2026 में NSE को नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया। इसके साथ ही NSE को IPO प्रक्रिया दोबारा शुरू करने, मर्चेंट बैंकर और कानूनी सलाहकार नियुक्त करने तथा लिस्टिंग दस्तावेज तैयार करने की अनुमति मिल गई।

निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने से NSE IPO को लेकर एक अहम कानूनी अड़चन दूर हो गई है। हालांकि यह फैसला तकनीकी रूप से क्षेत्राधिकार के आधार पर दिया गया है, लेकिन इससे एक्सचेंज की लिस्टिंग योजना को फिलहाल मजबूती मिली है।

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