‘घूसखोर पंडित’ टाइटल विवाद: क्या है पूरा मामला?
मनोज बाजपेयी की आने वाली फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ रिलीज़ से पहले ही बड़े विवादों में घिर गई है। फिल्म का नाम सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। आरोप है कि फिल्म का टाइटल एक विशेष समुदाय को अपमानजनक और नकारात्मक रूप में पेश करता है, जिससे सामाजिक सौहार्द को ठेस पहुंच सकती है।
- ‘घूसखोर पंडित’ टाइटल विवाद: क्या है पूरा मामला?
- UP Deputy CM ब्रजेश पाठक की सख्त प्रतिक्रिया
- FWICE ने निर्माताओं को जारी की चेतावनी
- FWICE का बयान: सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाई
- निर्माताओं को कड़ा अल्टीमेटम
- देशभर में प्रदर्शन, पुतले जलाए गए
- कानूनी मोर्चे पर भी बढ़ी मुश्किलें
- फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ में क्या है खास?
विवाद बढ़ने के बाद फिल्म का प्रमोशनल कंटेंट इंटरनेट से हटाया गया और रिपोर्ट्स के मुताबिक Netflix ने भी केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद फिल्म का टीज़र प्लेटफॉर्म से हटा लिया। अब इस पूरे मामले में FWICE (Federation of Western India Cine Employees), उत्तर प्रदेश सरकार और कई सामाजिक संगठनों की एंट्री ने विवाद को और गहरा कर दिया है।
UP Deputy CM ब्रजेश पाठक की सख्त प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि,
“फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोग भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से ब्राह्मण समाज को निशाना बना रहे हैं, जो बेहद निंदनीय है। ऐसी फिल्मों को सार्वजनिक रूप से रिलीज़ नहीं किया जाना चाहिए।”
उनके इस बयान के बाद यह साफ हो गया कि मामला सिर्फ मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन चुका है।
FWICE ने निर्माताओं को जारी की चेतावनी
इस विवाद के बीच FWICE ने फिल्म के निर्माताओं को औपचारिक चेतावनी जारी की है। संगठन ने एक पत्र लिखकर कई प्रमुख फिल्म संस्थाओं और OTT प्लेटफॉर्म्स को इस मुद्दे से अवगत कराया, जिनमें शामिल हैं:
IMPPA
Producers Guild of India
IFTPC
WIFPA
Netflix, Amazon Prime Video, Zee5 और Sony Liv
FWICE ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से कहा कि ‘घूसखोर पंडित’ जैसा टाइटल एक विशेष समुदाय को निशाना बनाता हुआ प्रतीत होता है और यह सामाजिक तनाव को जन्म दे सकता है।
FWICE का बयान: सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाई
FWICE ने अपने पत्र में लिखा कि:
“फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज, जो 36 संबद्ध संगठनों और हजारों कलाकारों व तकनीशियनों का प्रतिनिधित्व करता है, इस फिल्म के टाइटल पर गहरी आपत्ति दर्ज करता है। यह नाम अपमानजनक है और समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है।”
संगठन ने यह भी कहा कि फिल्म इंडस्ट्री एक प्रभावशाली माध्यम है और उस पर यह जिम्मेदारी बनती है कि वह समाज में नफरत या विभाजन को बढ़ावा न दे।
निर्माताओं को कड़ा अल्टीमेटम
FWICE ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि फिल्म के टाइटल को लेकर जरूरी कदम तुरंत नहीं उठाए गए, तो:
संगठन अपने सभी सदस्य कलाकारों और तकनीशियनों को
संबंधित निर्माता के प्रोजेक्ट्स से दूरी बनाने की सलाह देगा।
यह चेतावनी फिल्म के भविष्य पर बड़ा असर डाल सकती है।
देशभर में प्रदर्शन, पुतले जलाए गए
विवाद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा।
भोपाल, प्रयागराज समेत कई शहरों में ब्राह्मण संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया।
भोपाल में:
अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के कार्यकर्ताओं ने
“निर्माता नीरज पांडे मुर्दाबाद”
“Netflix बंद करो, FIR दर्ज करो”
जैसे नारे लगाए।
प्रयागराज में:
राष्ट्रीय परशुराम सेना के सदस्यों ने
नीरज पांडे और मनोज बाजपेयी के पुतले जलाए
सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शन हुआ
इन घटनाओं ने माहौल को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया।
कानूनी मोर्चे पर भी बढ़ी मुश्किलें
रिपोर्ट्स के मुताबिक:
लखनऊ के हजरतगंज थाने में
फिल्म के टाइटल को लेकर FIR दर्ज की गई है।
इसके अलावा:
दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है,
जिसमें Netflix पर रिलीज़ होने वाली इस फिल्म पर रोक लगाने की मांग की गई है।
इतना ही नहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को नोटिस भेजा है। आरोप है कि फिल्म का नाम नकारात्मक रूढ़ियों को बढ़ावा देता है।
फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ में क्या है खास?
फिल्म में मनोज बाजपेयी एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं, जिनका उपनाम ‘पंडित’ बताया जा रहा है।
हालांकि, निर्माताओं का पक्ष अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है और न ही उन्होंने विवाद पर कोई आधिकारिक बयान जारी किया है।
फिल्मी आज़ादी बनाम सामाजिक संवेदनशीलता
यह विवाद एक बार फिर उस बहस को जन्म देता है कि:
क्या रचनात्मक स्वतंत्रता की कोई सीमा होनी चाहिए?
या सामाजिक सद्भाव बनाए रखना ज्यादा जरूरी है?
FWICE और सामाजिक संगठनों का मानना है कि:
कला की आज़ादी के नाम पर
किसी समुदाय को ठेस पहुंचाना
स्वीकार्य नहीं हो सकता।
निष्कर्ष
‘घूसखोर पंडित’ विवाद अब केवल एक फिल्म के नाम तक सीमित नहीं रहा। यह मामला:
सामाजिक
राजनीतिक
और कानूनी
तीनों स्तरों पर गंभीर रूप ले चुका है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि:
निर्माता फिल्म के टाइटल में बदलाव करते हैं या नहीं
और OTT प्लेटफॉर्म्स इस पर क्या अंतिम फैसला लेते हैं।


