‘Kennedy’ मूवी रिव्यू: सिस्टम की सड़ांध और मुक्ति की तलाश पर राहुल भट्ट की सिहराती दस्तक

लॉकडाउन की खामोशी में गूंजती बंदूक की आवाज और अंतरात्मा की चीख

Dev
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राहुल भट्ट स्टारर ‘Kennedy’ में महामारी की पृष्ठभूमि पर अपराध, सत्ता और आत्मग्लानि की कहानी।Kennedy movie review Hindi

‘Kennedy’ मूवी रिव्यू: अंधेरे शहर में भटकता एक साया

जब स्क्रीन पर William Wordsworth की पंक्तियां उभरती हैं — “We poets in our youth begin in gladness; but thereof come in the end despondency and madness” — तो साफ हो जाता है कि यह फिल्म केवल अपराध कथा नहीं है, बल्कि एक आंतरिक संघर्ष की यात्रा है।

निर्देशक Anurag Kashyap अपनी पुरानी, बेबाक और असहज सिनेमा शैली में लौटते हैं। ‘Kennedy’ एक स्लो-बर्न नोयर ड्रामा है, जो धैर्य मांगता है और बदले में बेचैनी और विचार छोड़ जाता है।

कहानी: मृत घोषित पुलिसवाला, जो जिंदा है

फिल्म का केंद्र है उदय शेट्टी उर्फ ‘Kennedy’, जिसे प्रभावशाली अभिनेता Rahul Bhat ने निभाया है।

उदय को वर्षों पहले आधिकारिक रूप से मृत घोषित कर दिया गया था। लेकिन वह जीवित है — एक साए की तरह। वह एक भ्रष्ट पुलिस कमिश्नर राशिद खान के लिए हिटमैन का काम करता है। इस भूमिका में Mohit Takalkar ठंडे और चालाक सत्ता-प्रतिनिधि की तरह नजर आते हैं।

महामारी के दौर में जब शहर बंद है, अपराध का ढांचा भी चरमराया है। कमीशन की ‘कट’ सूख गई है और सत्ता का खेल और भी निर्मम हो गया है। इसी अंधेरे में Kennedy अपने अतीत का बदला लेने की कोशिश करता है — उस अंडरवर्ल्ड डॉन से जिसने उसका परिवार तबाह कर दिया।

लॉकडाउन की पृष्ठभूमि: एक सिहराती मुंबई

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका वातावरण है। महामारी के दौरान खाली पड़ी सड़कों, मास्क पहने चेहरों और सन्नाटे से भरे शहर को सिनेमैटोग्राफर Sylvester Fonseca ने बेहद प्रभावशाली तरीके से कैद किया है।

मुंबई यहां एक चरित्र की तरह उभरती है — विशाल भी और घुटन भरी भी। अंधेरी गलियां और धुंधली रोशनी फिल्म को एक क्लॉस्ट्रोफोबिक एहसास देती हैं।

सत्ता, अपराध और सड़ांध

Anurag Kashyap हमेशा से सिस्टम की परतें उधेड़ने के लिए जाने जाते हैं। ‘Kennedy’ में भी वह पुलिस, राजनीति और कॉर्पोरेट गठजोड़ की उस सच्चाई को सामने रखते हैं, जो अक्सर खामोशी में छिपी रहती है।

फिल्म 2021 के चर्चित Antilia बम कांड जैसी वास्तविक घटनाओं की छाया महसूस कराती है, हालांकि यह सीधे तौर पर किसी घटना को दोहराती नहीं।

यह कहानी दिखाती है कि संकट के समय भी भ्रष्टाचार कैसे फलता-फूलता है। महामारी, जो आम लोगों के लिए त्रासदी थी, सत्ता के खेल में एक और अवसर बन जाती है।

Charlie: उम्मीद या भ्रम?

Kennedy की जिंदगी में एक रहस्यमयी महिला चार्ली का प्रवेश होता है, जिसे Sunny Leone ने निभाया है।

चार्ली का किरदार फिल्म में भावनात्मक परत जोड़ता है। वह एक ऐसी महिला है जो परिस्थितियों से जूझ रही है। हालांकि उनका प्रसिद्ध नर्वस लाफ्टर हर दृश्य में फिट नहीं बैठता, लेकिन कई पलों में वह किरदार की असुरक्षा और टूटन को प्रभावी बनाता है।

राहुल भट्ट: फिल्म की धड़कन

Rahul Bhat इस फिल्म की आत्मा हैं। उनका अभिनय तीखा भी है और संवेदनशील भी।

कभी वह गुस्से से भरे नजर आते हैं, तो कभी भीतर से टूटे हुए इंसान की तरह। वह किरदार के अस्तित्व संकट को इतनी गहराई से जीते हैं कि दर्शक उनके दर्द को महसूस करने लगते हैं।

स्क्रीनप्ले कुछ जगहों पर बिखरा हुआ लगता है, लेकिन Rahul Bhat अपने प्रदर्शन से उसे संभाल लेते हैं।

निर्देशन और संपादन

Anurag Kashyap मूड को प्राथमिकता देते हैं, गति को नहीं। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो तुरंत असर नहीं करते, बल्कि धीरे-धीरे भीतर उतरते हैं।

हालांकि कुछ हिस्सों में संपादन थोड़ा असमान लगता है और राजनीतिक टिप्पणी कभी-कभी आधी-अधूरी प्रतीत होती है। सेंसरशिप के निशान भाषा और प्रस्तुति में महसूस होते हैं।

फिर भी फिल्म अपनी अलग पहचान बनाए रखती है — एक ऐसी पहचान जो व्यावसायिक सिनेमा से अलग खड़ी है।

क्या देखें या छोड़ दें?

‘Kennedy’ हर दर्शक के लिए नहीं है। यह तेज रफ्तार थ्रिलर नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक चिंतन है।

अगर आप ऐसी फिल्मों के शौकीन हैं जो आपको सोचने पर मजबूर करें, तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

यह फिल्म सिस्टम की सड़ांध पर एक आईना है — और उस इंसान की कहानी, जो उसी सड़ांध का हिस्सा बन चुका है।

अंतिम फैसला

‘Kennedy’ एक असहज, बेचैन और विचारोत्तेजक अनुभव है।

Rahul Bhat का प्रदर्शन फिल्म को ऊंचाई देता है। Anurag Kashyap एक बार फिर दिखाते हैं कि वह अंधेरे में भी कहानी खोज सकते हैं।

फिल्म पूरी तरह निशाने पर नहीं बैठती, लेकिन उसका साहस और वातावरण उसे यादगार बनाता है।

यह मुक्ति की तलाश में भटकते एक आदमी की कहानी है — और उस सिस्टम की, जो खुद सड़ चुका है।

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