45 साल बाद यादों में लौटे अनिल कपूर: ‘कहां कहां से गुज़र गया’ को बताया जीवन का मील का पत्थर, ‘सुबेदार’ के प्रमोशन में व्यस्त अभिनेता

अनिश्चित शुरुआत से ऐतिहासिक मुकाम तक – अनिल कपूर की सिनेमाई यात्रा

Dev
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45 साल बाद भी अनिल कपूर के दिल के बेहद करीब है ‘कहां कहां से गुज़र गया’अनिल कपूर, कहां कहां से गुज़र गया

हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में भले ही बॉक्स ऑफिस पर बड़ी न रही हों, लेकिन कलाकारों के जीवन में वे हमेशा के लिए अमर हो जाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है कहां कहां से गुज़र गया, जिसने अभिनेता अनिल कपूर के करियर की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। फिल्म के 45 साल पूरे होने पर अनिल कपूर ने सोशल मीडिया पर एक भावुक नोट साझा किया, जिसने उनके संघर्ष भरे शुरुआती दिनों की यादें ताज़ा कर दीं।

एक शो से शुरू हुई कहानी

अनिल कपूर ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरीज़ पर फिल्म से जुड़ी थ्रोबैक तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि यह फिल्म शुरुआत में खरीदार तक नहीं ढूंढ पा रही थी। हालात ऐसे थे कि फिल्म को रिलीज़ होने का सिर्फ एक शो मिला। लेकिन यही एक शो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

उन्होंने लिखा,
“45 साल पहले एक ऐसी फिल्म, जिसे खरीदार मिलने में परेशानी हो रही थी, आखिरकार सिर्फ एक शो के साथ रिलीज़ हुई और वही एक शो मेरे जीवन का अहम मोड़ बन गया।”

यह बयान बताता है कि सिनेमा में सफलता हमेशा पहले दिन नहीं मिलती, कई बार समय ही किसी कलाकार की मेहनत को पहचान दिलाता है।

दिग्गजों के साथ पहला अनुभव

‘कहां कहां से गुज़र गया’ का निर्देशन प्रसिद्ध फिल्मकार एम. एस. सत्यु ने किया था, जबकि सिनेमैटोग्राफी की जिम्मेदारी ईशान आर्या के पास थी। इस फिल्म में अनिल कपूर के साथ युवा पंकज कपूर भी नजर आए थे, जो उस वक्त अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे।

अनिल कपूर ने अपने नोट में लिखा कि इतने शुरुआती दौर में ऐसे दिग्गजों के साथ काम करना किसी सपने से कम नहीं था। उन्होंने कहा कि इस फिल्म ने उन्हें अभिनय के साथ-साथ धैर्य, संघर्ष और आत्मविश्वास का महत्व भी सिखाया।

अनिश्चितता से मील का पत्थर तक

अनिल कपूर ने भावुक अंदाज़ में लिखा,
“जो सफर अनिश्चितता के साथ शुरू हुआ, वही आज मेरे जीवन का एक मील का पत्थर बन चुका है। 45 साल बाद भी मैं उस संघर्ष, उन सीखों और उस फिल्म के लिए आभारी हूं जिसने मेरी राह बनाई।”

यह शब्द सिर्फ एक फिल्म की सालगिरह नहीं, बल्कि एक अभिनेता के आत्मसंघर्ष की कहानी भी बयां करते हैं। यही वजह है कि यह फिल्म आज भी फिल्मी इतिहास में खास स्थान रखती है।

क्यों खास है ‘कहां कहां से गुज़र गया’?

भले ही यह फिल्म उस दौर की मेनस्ट्रीम कमर्शियल फिल्मों जैसी न रही हो, लेकिन इसकी संवेदनशील कहानी, यथार्थवादी प्रस्तुति और मजबूत अभिनय ने इसे अलग पहचान दी। समय के साथ यह फिल्म अनिल कपूर के करियर के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखी जाने लगी।

‘सुबेदार’ के प्रमोशन में व्यस्त अनिल कपूर

पुरानी यादों में डूबने के साथ-साथ अनिल कपूर आज अपने नए प्रोजेक्ट को लेकर भी चर्चा में हैं। अभिनेता इन दिनों अपनी आगामी फिल्म सुबेदार के प्रमोशन में जुटे हुए हैं। यह फिल्म सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म Amazon Prime Video पर रिलीज़ होने जा रही है।

फिल्म का ट्रेलर हाल ही में लॉन्च किया गया, जिसे दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। वहीं फिल्म का पहला गाना ‘The Lalla Anthem’ भी चर्चा में है, जिसमें क्रिकेटर हरभजन सिंह की झलक देखने को मिलती है।

दमदार टीम और कहानी

‘सुबेदार’ का निर्देशन सुरेश त्रिवेणी ने किया है, जो इससे पहले ‘तुम्हारी सुलु’ और ‘जालसा’ जैसी फिल्मों के लिए सराहे जा चुके हैं। यह एक इमोशनल एक्शन ड्रामा बताई जा रही है, जिसमें अनिल कपूर के साथ राधिका मदान अहम भूमिका में नजर आएंगी।

फिल्म में सौरभ शुक्ला, मोना सिंह समेत कई मजबूत कलाकार भी शामिल हैं। यह फिल्म 5 मार्च को ओटीटी पर प्रीमियर होगी।

अनुभव और ऊर्जा का संगम

जहां ‘कहां कहां से गुज़र गया’ ने अनिल कपूर को पहचान दी, वहीं ‘सुबेदार’ उनके अनुभव और परिपक्व अभिनय का प्रमाण मानी जा रही है। चार दशकों से ज्यादा के करियर में अनिल कपूर ने खुद को हर दौर के साथ ढालने की मिसाल पेश की है।

निष्कर्ष

अनिल कपूर की कहानी हर उस कलाकार के लिए प्रेरणा है, जो आज संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। एक ऐसा अभिनेता, जिसकी पहली फिल्मों को रिलीज़ के लिए संघर्ष करना पड़ा, वही आज भारतीय सिनेमा का मजबूत स्तंभ बन चुका है।

45 साल बाद भी ‘कहां कहां से गुज़र गया’ को याद कर भावुक होना यह साबित करता है कि सिनेमा सिर्फ सफलता का नहीं, बल्कि संघर्ष, सीख और धैर्य का भी नाम है। और शायद यही वजह है कि अनिल कपूर आज भी उतने ही प्रासंगिक, ऊर्जावान और प्रेरणादायक हैं।

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