Budget 2026 से पहले STT पर बहस तेज: नितिन कामथ क्यों चाहते हैं सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स में कटौती?

ऊंचा टैक्स, घटता वॉल्यूम: क्या STT में कटौती से बाजार और सरकार दोनों को फायदा होगा?

Dev
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Budget 2026 से पहले शेयर बाजार में STT को लेकर नई बहसSTT टैक्स

Stock Market और Tax Policy: Budget 2026 से पहले क्यों चर्चा में है STT?

केंद्रीय बजट 2026 से पहले शेयर बाजार और टैक्सेशन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। बीते एक साल में बाजार के रिटर्न मिले-जुले रहे हैं, वहीं डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पर बढ़ते टैक्स ने रिटेल निवेशकों और ट्रेडर्स की चिंता बढ़ा दी है।

इसी बीच Zerodha के को-फाउंडर नितिन कामथ ने सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका मानना है कि डेरिवेटिव्स पर STT में की गई तेज बढ़ोतरी न सिर्फ ट्रेडिंग वॉल्यूम को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि इससे सरकार की टैक्स कलेक्शन भी उम्मीद से कम हो सकती है।

डेरिवेटिव्स पर बढ़ा STT क्यों बना चिंता का कारण?

नितिन कामथ के अनुसार, 2024 में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पर टैक्स दरों में बढ़ोतरी के बाद बाजार में गतिविधि साफ तौर पर कम होती दिखाई दी।
उन्होंने कहा कि ज्यादा ट्रांजैक्शन कॉस्ट का सीधा असर छोटे और मझोले ट्रेडर्स पर पड़ता है, जो पहले ही सीमित पूंजी के साथ बाजार में आते हैं।

कामथ का मानना है कि जब ट्रेडिंग महंगी हो जाती है, तो लोग या तो बाजार से दूरी बना लेते हैं या ट्रेडिंग की फ्रीक्वेंसी घटा देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि वॉल्यूम घटता है और अंततः सरकार को मिलने वाला STT कलेक्शन भी उम्मीद से कम रह जाता है।

नितिन कामथ का तर्क: STT और LTCG का संतुलन जरूरी

नितिन कामथ ने यह भी याद दिलाया कि STT की शुरुआत उस दौर में हुई थी जब लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स शून्य था
लेकिन बाद में जब LTCG टैक्स दोबारा लागू किया गया, तब भी STT को उसी स्तर पर बनाए रखा गया या कुछ मामलों में बढ़ा दिया गया।

उनके मुताबिक, जब निवेशक पहले ही LTCG और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन टैक्स चुका रहे हैं, तो हर ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त STT बोझ बन जाता है।
यही वजह है कि वे लंबे समय से STT में कटौती की उम्मीद कर रहे हैं।

बाजार ठंडा पड़ा, टैक्स कलेक्शन भी दबाव में

नितिन कामथ ने यह भी संकेत दिया कि बाजार की मौजूदा स्थिति में ट्रेडिंग वॉल्यूम में आई गिरावट का असर सरकारी राजस्व पर भी पड़ा है।
जब बाजार में तेजी होती है, तब टैक्स दरें ज्यादा होने के बावजूद कलेक्शन अच्छा रहता है।
लेकिन ठंडे या साइडवेज बाजार में ज्यादा टैक्स उलटा असर डालता है।

उनका कहना है कि तेज टैक्स बढ़ोतरी हमेशा उत्पादक नहीं होती, क्योंकि इससे भागीदारी कम होती है और लॉन्ग-टर्म में सरकार को नुकसान हो सकता है।

रिटेल निवेशकों पर सबसे ज्यादा असर

भारत के शेयर बाजार में पिछले कुछ वर्षों में रिटेल निवेशकों की भागीदारी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची है।
डिस्काउंट ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल ट्रेडिंग ने लाखों नए निवेशकों को बाजार से जोड़ा।

लेकिन नितिन कामथ का मानना है कि:

  • ज्यादा STT

  • ब्रोकरेज

  • एक्सचेंज चार्ज

  • GST

इन सबका कुल बोझ मिलकर रिटेल ट्रेडर्स के लिए ट्रेडिंग को महंगा बना देता है।
परिणामस्वरूप, कई नए निवेशक या तो एक्टिव ट्रेडिंग छोड़ देते हैं या फिर बाजार से पूरी तरह बाहर हो जाते हैं।

Budget 2026 से क्या उम्मीद?

Budget 2026 से पहले बाजार की नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार के पास दो रास्ते हैं:

  1. STT दरों में आंशिक कटौती, खासकर डेरिवेटिव्स सेगमेंट में

  2. टैक्स स्ट्रक्चर का पुनर्संतुलन, ताकि ज्यादा वॉल्यूम के जरिए राजस्व बढ़ाया जा सके

अगर STT में कटौती होती है, तो इससे:

  • ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ सकता है

  • बाजार में लिक्विडिटी सुधर सकती है

  • रिटेल निवेशकों का भरोसा मजबूत हो सकता है

क्या ज्यादा टैक्स वाकई फायदेमंद है?

नितिन कामथ का मुख्य तर्क यही है कि बहुत ज्यादा ट्रांजैक्शन कॉस्ट काउंटरप्रोडक्टिव साबित हो सकती है
उनका कहना है कि टैक्स का मकसद राजस्व बढ़ाना होना चाहिए, न कि बाजार की गति को धीमा करना।

अगर कम टैक्स के चलते ज्यादा लोग बाजार में भाग लेते हैं, तो कुल कलेक्शन अपने-आप बढ़ सकता है — यही सिद्धांत वे STT पर भी लागू मानते हैं।

SamaypeNews की राय

SamaypeNews के अनुसार, STT बनाम ट्रेडिंग वॉल्यूम की यह बहस आने वाले बजट में अहम मुद्दा बन सकती है।
भारत का शेयर बाजार अब केवल बड़े निवेशकों तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों रिटेल निवेशक इसकी रीढ़ बन चुके हैं।

ऐसे में टैक्स पॉलिसी बनाते समय लॉन्ग-टर्म ग्रोथ, रिटेल भागीदारी और सरकारी राजस्व — तीनों के बीच संतुलन बेहद जरूरी है।

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