भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) की एक प्रसिद्ध पंक्ति है —
“The safety, honour and welfare of your country come first, always and every time.”
कुछ लोगों के लिए यह पंक्ति सिर्फ शब्द नहीं होती, बल्कि जीवन का अंतिम सत्य बन जाती है। कई बार यह परीक्षा उस उम्र में आ जाती है, जब ज़्यादातर युवा अपने भविष्य की योजनाएँ बना रहे होते हैं।
ऐसी ही कहानियों को बड़े पर्दे पर लाने जा रही है फिल्म ‘Ikkis’, जो भारत के सबसे युवा परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरगाथा बताएगी। फिल्म की रिलीज से पहले आइए नज़र डालते हैं उन 5 युवा नायकों पर, जिन्होंने 21 या उससे कम उम्र में भारत की सैन्य और बलिदान की विरासत को अमर बना दिया।
1. राइफलमैन जसवंत सिंह रावत – 1962 का अकेला योद्धा
1962 के भारत-चीन युद्ध में अरुणाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों पर राइफलमैन जसवंत सिंह रावत ने जो किया, वह आज भी सेना की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में शामिल है।
महज 21 साल की उम्र में उन्होंने 72 घंटे तक चीनी सेना को अकेले रोके रखा। उन्होंने अलग-अलग जगहों से फायरिंग कर दुश्मन को यह भ्रम दिया कि सामने पूरी बटालियन मौजूद है।
आज भी जसवंतगढ़ में उनकी याद में:
-
उनके जूते रोज पॉलिश होते हैं
-
बिस्तर लगाया जाता है
-
उन्हें सेना में मरणोपरांत पदोन्नति दी जाती है
वे भारतीय सेना के इतिहास में ऐसे इकलौते सैनिक हैं।
2. भगत सिंह – क्रांति की चिंगारी
भगत सिंह को अक्सर 23 साल की उम्र में शहीद हुए क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उनका सबसे ऐतिहासिक कदम — सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंकना — उन्होंने महज 21 साल की उम्र में उठाया था।
जब ज़्यादातर युवा करियर की शुरुआत करते हैं, तब भगत सिंह:
-
स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक रीढ़ बन चुके थे
-
युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत थे
-
“बहरों को सुनाने” का साहस कर चुके थे
‘इक्कीस’ की यह आग सिर्फ युद्धभूमि में नहीं, आज़ादी की लड़ाई में भी जली।
3. साहिबज़ादा जोरावर सिंह और फतेह सिंह – बलिदान की नींव
हर साल 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस मनाया जाता है। यह दिन गुरु गोबिंद सिंह जी के पुत्रों — साहिबज़ादा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और साहिबज़ादा फतेह सिंह (7 वर्ष) के बलिदान को समर्पित है।
हालांकि वे 21 साल के नहीं थे, लेकिन उनका बलिदान उस “इक्कीस की भावना” की आत्मा है:
-
अन्याय के सामने न झुकना
-
धर्म और स्वाभिमान के लिए बलिदान
-
मौत के सामने भी अडिग रहना
यही सिद्धांत बाद में अरुण खेत्रपाल जैसे सैनिकों के जीवन दर्शन बने।
4. सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल – ‘Ace of Aces’
फिल्म Ikkis का केंद्र बिंदु, अरुण खेत्रपाल, भारतीय सैन्य इतिहास का स्वर्णिम अध्याय हैं।
1971 के भारत-पाक युद्ध में:
-
17 पूना हॉर्स रेजीमेंट के अधिकारी
-
युद्ध से सिर्फ 6 महीने पहले कमीशन
-
उम्र सिर्फ 21 साल
बासंतार की लड़ाई में उन्होंने अकेले 10 दुश्मन टैंकों को नष्ट किया। जब उनके टैंक में आग लगी और उन्हें पीछे हटने का आदेश मिला, तो उनका जवाब इतिहास बन गया:
“No Sir, I will not abandon my tank. My gun is still working.”
कुछ ही मिनटों बाद वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उन्होंने रणनीतिक पुलहेड को गिरने नहीं दिया। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
5. कारगिल के ‘इक्कीस’ – विक्रम बत्रा और योगेंद्र सिंह यादव
1999 के कारगिल युद्ध में अधिकांश सैनिक 20–22 वर्ष की उम्र के थे।
कैप्टन विक्रम बत्रा
हालांकि वे 24 साल के थे, लेकिन उनका नारा —
“ये दिल मांगे मोर” — आज भी युवाओं की रगों में जोश भर देता है।
सुबेदार योगेंद्र सिंह यादव
-
उम्र सिर्फ 19 साल
-
टाइगर हिल पर खड़ी चट्टान पर चढ़ाई
-
15 गोलियां लगने के बावजूद मिशन पूरा
उन्हें भी परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। ये साबित करता है कि भारतीय सेना में 21 सिर्फ उम्र नहीं, साहस की पहचान है।
आज के समय में ‘Ikkis’ क्यों ज़रूरी है?
निर्देशक श्रीराम राघवन की फिल्म Ikkis ऐसे समय आ रही है, जब नई पीढ़ी को यह याद दिलाना जरूरी है कि:
-
भारत की सीमाएँ नक्शे से नहीं
-
बल्कि 21 साल के युवाओं के खून और हौसले से बनी हैं
अगस्त्य नंदा जैसे डेब्यूटेंट को कास्ट करना फिल्म को और वास्तविक बनाता है, क्योंकि यह उस मासूमियत को दिखाता है, जो बलिदान को और भी मार्मिक बना देती है।

SamaypeNews Verdict
जब आप इस नए साल सिनेमा हॉल में Ikkis देखेंगे, तो याद रखिएगा —
यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उन अनगिनत युवाओं की कहानी है, जिन्होंने अपनी 22वीं सालगिरह से पहले देश का भविष्य सुरक्षित कर दिया।
