वैश्विक वित्तीय बाजारों में एक बार फिर अमेरिकी डॉलर की ताकत देखने को मिली है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी की उम्मीदों ने डॉलर को मजबूती दी है, जिसका सीधा असर भारतीय रुपये और एशियाई मुद्राओं पर पड़ा है। मंगलवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले हल्की कमजोरी के साथ बंद हुआ, जबकि शेयर बाजार में भी गिरावट देखने को मिली।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े संकेत और बढ़ती बॉन्ड यील्ड्स निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर आकर्षित कर रही हैं। यही कारण है कि डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बना हुआ है।
कितनी कमजोर हुई भारतीय मुद्रा?
मंगलवार के कारोबारी सत्र में भारतीय रुपया 94.7350 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। पिछले सत्र में यह 94.6775 के स्तर पर था। यानी रुपये में लगभग 0.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि यह गिरावट बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन बाजार विशेषज्ञ इसे एक महत्वपूर्ण संकेत मान रहे हैं क्योंकि पिछले कुछ दिनों से रुपया स्थिरता की ओर बढ़ रहा था। अब अमेरिकी ब्याज दरों की नई चिंताओं ने फिर से दबाव बढ़ा दिया है।
क्यों मजबूत हो रहा है डॉलर?
अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 101.18 के स्तर तक पहुंच गया, जो पिछले एक साल के उच्चतम स्तरों में से एक माना जा रहा है। डॉलर इंडेक्स दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत को दर्शाता है।
इस तेजी के पीछे मुख्य कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व की संभावित सख्त मौद्रिक नीति है। बाजार में यह धारणा बन रही है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए फेड आने वाले महीनों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है।
मनी मार्केट्स लगभग पूरी तरह इस संभावना को मूल्यांकन में शामिल कर चुके हैं कि सितंबर तक अमेरिका में एक और ब्याज दर वृद्धि देखने को मिल सकती है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड्स भी बनी चिंता
फेड की नीतियों को लेकर बढ़ती उम्मीदों का असर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड्स पर भी दिखाई दे रहा है।
विशेष रूप से 2-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड जून महीने में अब तक लगभग 18 बेसिस पॉइंट बढ़ चुकी है और 4.19 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है।
जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड्स बढ़ती हैं तो वैश्विक निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलता है। ऐसे में वे जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों में निवेश करना पसंद करते हैं। इसका असर भारत जैसे उभरते बाजारों पर पड़ता है।
भारतीय शेयर बाजार में क्यों आई गिरावट?
रुपये की कमजोरी के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजार भी दबाव में रहा।
मंगलवार को भारतीय इक्विटी बाजार में लगभग 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट केवल घरेलू कारणों से नहीं बल्कि वैश्विक बाजारों में बढ़ती चिंता के कारण भी देखी गई।
एशियाई बाजारों को ट्रैक करने वाला प्रमुख MSCI एशिया इंडेक्स भी 3 प्रतिशत से अधिक फिसल गया। जापान से लेकर अमेरिका तक निवेशकों में सतर्कता का माहौल बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब ब्याज दरें बढ़ने की आशंका होती है तो शेयर बाजारों में निवेश की आकर्षकता कम हो जाती है। इससे इक्विटी बाजारों में बिकवाली बढ़ जाती है।
एशियाई मुद्राओं पर भी दबाव
भारतीय रुपया अकेली मुद्रा नहीं है जिस पर दबाव देखने को मिला हो।
डॉलर की मजबूती के कारण अधिकांश एशियाई मुद्राएं 0.1 प्रतिशत से 0.6 प्रतिशत तक कमजोर हुई हैं। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर डॉलर की मांग बढ़ी हुई है।
ईरान-अमेरिका समझौते से मिली थी राहत
कुछ सप्ताह पहले तक रुपये पर भू-राजनीतिक तनाव का भी असर देखा जा रहा था।
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने तथा शांति वार्ता में प्रगति के संकेत मिलने से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई थी। इससे भारतीय मुद्रा को कुछ राहत मिली थी।
अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की छूट भी दी है। इससे ऊर्जा बाजार में स्थिरता का माहौल बना और तेल कीमतों पर दबाव कम हुआ।
लेकिन अब फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बढ़ती चिंताओं ने फिर से रुपये के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।
आगे रुपये का क्या होगा?
मुद्रा बाजार के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में रुपया दबाव में रह सकता है।
हालांकि विदेशी मुद्रा जमा, विदेशी उधारी और डेट निवेश के जरिए डॉलर प्रवाह की उम्मीदें भी बनी हुई हैं, जो रुपये को बड़ी गिरावट से बचा सकती हैं।
बाजार में यह भी देखा जा रहा है कि आयातक (Importers) लगातार हेजिंग बढ़ा रहे हैं जबकि निर्यातकों (Exporters) की गतिविधि अपेक्षाकृत कम है। इससे डॉलर की मांग मजबूत बनी हुई है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
वर्तमान परिस्थितियों में निवेशकों के लिए घबराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन सतर्क रहना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि:
- लंबी अवधि के निवेश पर फोकस रखें।
- केवल मुद्रा उतार-चढ़ाव देखकर निवेश निर्णय न लें।
- मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों में निवेश बनाए रखें।
- वैश्विक ब्याज दरों और अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों पर नजर रखें।
- पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखें।
निष्कर्ष
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की संभावित ब्याज दर बढ़ोतरी ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में नई हलचल पैदा कर दी है। डॉलर की मजबूती के कारण भारतीय रुपया दबाव में है और शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिल रही है। हालांकि भारत की आर्थिक बुनियाद अभी भी मजबूत मानी जा रही है, लेकिन वैश्विक घटनाक्रमों का असर निकट भविष्य में बाजारों पर जारी रह सकता है।
निवेशकों के लिए यह समय भावनात्मक फैसलों से बचने और दीर्घकालिक रणनीति अपनाने का है। डॉलर, ब्याज दरों और विदेशी निवेश प्रवाह पर नजर रखना आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण रहेगा।


