सेबी की नजर अनलिस्टेड शेयर बाजार पर, निवेशकों के लिए क्यों है अहम खबर?
भारत के शेयर बाजार में तेजी से बढ़ते अनलिस्टेड शेयर ट्रेडिंग को लेकर अब सेबी (SEBI) ने गंभीर रुख अपनाया है। बाजार नियामक यह जांच कर रहा है कि क्या उसे ऐसे शेयरों पर निगरानी रखने का अधिकार है, जो अभी किसी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट नहीं हैं।
- सेबी की नजर अनलिस्टेड शेयर बाजार पर, निवेशकों के लिए क्यों है अहम खबर?
- सेबी और केंद्र सरकार के बीच चल रही है बातचीत
- क्या होता है अनलिस्टेड शेयर बाजार?
- IPO प्राइसिंग में मिसमैच बना सेबी की चिंता
- निवेशकों के लिए क्यों है यह बड़ा खतरा?
- अनलिस्टेड कंपनियों पर सीधे नियम क्यों नहीं लागू कर सकता सेबी?
- NSE IPO पर भी सेबी का अपडेट
SamayPenews के मुताबिक, यह मुद्दा इसलिए अहम हो गया है क्योंकि कई कंपनियों के अनलिस्टेड शेयरों की कीमत और बाद में IPO के दौरान तय होने वाली वैल्यूएशन में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। इससे रिटेल और HNI निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सेबी और केंद्र सरकार के बीच चल रही है बातचीत
मुंबई में आयोजित Association of Investment Bankers of India (AIBI) Annual Convention 2025-26 के दौरान सेबी चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने इस मुद्दे पर खुलकर बात की।
उन्होंने कहा:
“यह मामला कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय (MCA) के साथ चर्चा में है। हमें यह देखना है कि क्या हमारे पास अनलिस्टेड क्षेत्र में दखल देने की नियामक शक्तियां हैं और वह दायरा कहां तक जाता है।”
इस बयान से साफ है कि आने वाले समय में अनलिस्टेड शेयर बाजार पर रेगुलेटरी ढांचा बदल सकता है।
क्या होता है अनलिस्टेड शेयर बाजार?
अनलिस्टेड शेयर उन कंपनियों के शेयर होते हैं जो अभी किसी भी स्टॉक एक्सचेंज जैसे NSE या BSE पर लिस्ट नहीं हैं। निवेशक आमतौर पर इन शेयरों में निवेश करते हैं:
प्रमोटर्स या मौजूदा शेयरधारकों से सीधे
ESOP (Employee Stock Option Plan) के जरिए
अनऑफिशियल ब्रोकर्स और इंटरमीडियरीज के माध्यम से
हालांकि, इन शेयरों में निवेश हाई-रिस्क माना जाता है क्योंकि:
कंपनियों पर डिस्क्लोजर नियम लागू नहीं होते
फाइनेंशियल डेटा सीमित या देर से मिलता है
कीमतें पूरी तरह मार्केट सेंटिमेंट पर निर्भर होती हैं
IPO प्राइसिंग में मिसमैच बना सेबी की चिंता
सेबी चेयरमैन ने सबसे बड़ी चिंता यह जताई कि जब कोई कंपनी IPO लाती है, तब:
अनलिस्टेड मार्केट में शेयर की कीमत कुछ और होती है
IPO के बुक बिल्डिंग प्रोसेस में कीमत काफी अलग निकलती है
तुहिन कांता पांडे ने कहा:
“जब लिस्टिंग का समय आता है, तो अनलिस्टेड साइड पर तय कीमत और बुक बिल्डिंग से निकली कीमत में बड़ा अंतर देखने को मिलता है।”
यही वजह है कि सेबी अब इस पूरे सिस्टम पर नजर डालने पर मजबूर है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह बड़ा खतरा?
SamayPenews के विश्लेषण के अनुसार, अनलिस्टेड शेयर बाजार में:
कई बार IPO से पहले शेयर ओवरवैल्यूड हो जाते हैं
लिस्टिंग के बाद कीमत गिरने से निवेशकों को नुकसान
अफवाहों और ग्रे मार्केट ट्रेंड से कीमतें प्रभावित
अगर सेबी इस सेगमेंट में एंट्री करता है, तो निवेशकों को:
ज्यादा ट्रांसपेरेंसी
बेहतर प्राइस डिस्कवरी
गलत सेलिंग प्रैक्टिस पर लगाम
जैसे फायदे मिल सकते हैं।
अनलिस्टेड कंपनियों पर सीधे नियम क्यों नहीं लागू कर सकता सेबी?
सेबी चेयरमैन ने साफ किया कि:
लिस्टेड कंपनियों जैसे नियम अनलिस्टेड सेक्टर में सीधे लागू नहीं किए जा सकते
सेबी की भूमिका आमतौर पर IPO से पहले शुरू होती है
अनलिस्टेड कंपनियों की निगरानी अभी Ministry of Corporate Affairs के अधीन है
यही कारण है कि किसी भी नए नियम से पहले सरकार और सेबी के बीच सहमति जरूरी है।
NSE IPO पर भी सेबी का अपडेट
इसी कार्यक्रम में तुहिन कांता पांडे ने NSE IPO पर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने बताया कि:
NSE की सेटलमेंट एप्लीकेशन अभी सेबी की कमेटियों के पास है
सैद्धांतिक रूप से सेबी इस सेटलमेंट से सहमत है
जल्द ही No Objection Certificate (NOC) जारी हो सकता है
पिछले हफ्ते उन्होंने संकेत दिया था कि महीने के अंत तक NSE IPO को NOC मिल सकता है।
डार्क फाइबर केस बना था अड़चन
NSE का IPO लंबे समय से रुका हुआ है, जिसकी वजह है डार्क फाइबर केस। इस केस में आरोप था कि:
2010–2014 के बीच
कुछ हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स को
को-लोकेशन सर्वर तक तेज़ एक्सेस दिया गया
इस मामले के चलते NSE को लिस्टिंग से पहले सेबी की मंजूरी का इंतजार करना पड़ा।
SamayPenews Verdict
अनलिस्टेड शेयर बाजार पर सेबी की संभावित एंट्री आने वाले समय में:
IPO से पहले के “ग्रे एरिया” को साफ कर सकती है
निवेशकों के लिए जोखिम कम कर सकती है
बाजार में पारदर्शिता बढ़ा सकती है
हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि सेबी किस हद तक रेगुलेशन लाता है और क्या नए नियम निवेशकों के लिए वरदान साबित होते हैं या नहीं।


