- “दुनिया के किसी हिस्से का संकट पूरे ग्लोब को प्रभावित करता है”
- तेल की बढ़ती कीमतें क्यों बढ़ा रही हैं चिंता?
- भारतीय बाजारों की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
- बाजार में volatility क्यों बढ़ी?
- FPI Outflows पर भी बोले SEBI Chief
- Domestic Investors क्यों बने हुए हैं मजबूत सहारा?
- क्या आने वाले समय में और बढ़ सकती है महंगाई?
- Global Markets से जुड़ चुका है Indian Market
West Asia में जारी तनाव और संघर्ष का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखाई देने लगा है। बढ़ती तेल कीमतों, सप्लाई चेन में बाधा और महंगाई की आशंकाओं के बीच वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता लगातार बढ़ रही है।
इसी बीच Securities and Exchange Board of India के चेयरमैन Tuhin Kanta Pandey ने भारतीय बाजारों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक संकट के बावजूद भारतीय शेयर बाजार अलग-अलग प्रकार के shocks को absorb करने की क्षमता रखते हैं।
उन्होंने यह बयान भुवनेश्वर में आयोजित Regional Investors Seminar for Awareness कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत में दिया।
“दुनिया के किसी हिस्से का संकट पूरे ग्लोब को प्रभावित करता है”
Tuhin Kanta Pandey ने कहा कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह interconnected हो चुकी है। ऐसे में यदि दुनिया के किसी एक हिस्से में संकट आता है, तो उसका असर बाकी देशों पर भी पड़ता है।
उन्होंने कहा:
“West Asia में चल रहे संघर्ष के कारण तेल सप्लाई चेन और उसकी कीमतें प्रभावित हुई हैं। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है।”
उन्होंने आगे चेतावनी दी कि इससे inflationary risks यानी महंगाई का खतरा भी बढ़ सकता है। साथ ही spillover effect और second-order effects का असर भी आने वाले समय में देखने को मिल सकता है।
तेल की बढ़ती कीमतें क्यों बढ़ा रही हैं चिंता?
West Asia दुनिया के सबसे बड़े oil producing regions में से एक माना जाता है। यहां किसी भी तरह का तनाव सीधे तौर पर global crude oil prices को प्रभावित करता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
तेल महंगा होने का असर कई क्षेत्रों पर पड़ता है:
- पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती हैं
- परिवहन लागत बढ़ती है
- महंगाई बढ़ सकती है
- कंपनियों की लागत बढ़ती है
- Fiscal deficit पर दबाव आता है
इसी वजह से निवेशक फिलहाल वैश्विक हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
भारतीय बाजारों की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
हालांकि वैश्विक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं, लेकिन Tuhin Kanta Pandey ने भारतीय बाजारों की मजबूती पर भरोसा जताया।
उन्होंने कहा कि भारतीय बाजारों की सबसे बड़ी ताकत उनकी resilience यानी लचीलापन है।
उनके अनुसार:
“भारतीय बाजार अलग-अलग प्रकार के shocks को absorb करने में सक्षम हैं और जब संकट खत्म होता है तो बाजार फिर से अपने सामान्य trajectory पर लौट आते हैं।”
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाजारों में uncertainty लगातार बनी हुई है।
बाजार में volatility क्यों बढ़ी?
पिछले कुछ हफ्तों में भारतीय शेयर बाजार में भी काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
BSE Sensex और Nifty 50 में कई बार तेज गिरावट और रिकवरी देखने को मिली।
विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हैं:
- West Asia conflict
- बढ़ती crude oil prices
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली
- महंगाई की चिंता
- वैश्विक geopolitical tensions
- डॉलर की मजबूती
इन सभी वजहों ने बाजार में volatility बढ़ा दी है।
FPI Outflows पर भी बोले SEBI Chief
Tuhin Kanta Pandey ने यह भी स्वीकार किया कि सितंबर 2024 के बाद से भारतीय बाजारों से Foreign Portfolio Investors यानी FPIs का कुछ पैसा बाहर गया है।
लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि घरेलू निवेशकों का भरोसा अब भी मजबूत बना हुआ है।
भारत में पिछले कुछ वर्षों में retail investors की संख्या तेजी से बढ़ी है। SIP निवेश और mutual fund participation में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है।
यही वजह है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजारों में पूरी तरह panic देखने को नहीं मिला।
Domestic Investors क्यों बने हुए हैं मजबूत सहारा?
पहले भारतीय शेयर बाजार काफी हद तक विदेशी निवेशकों पर निर्भर माने जाते थे। लेकिन अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है।
आज:
- करोड़ों नए demat accounts खुले हैं
- SIP inflows लगातार रिकॉर्ड स्तर पर हैं
- retail participation बढ़ा है
- domestic institutional investors ज्यादा सक्रिय हुए हैं
इसी कारण बाजार में stability पहले की तुलना में ज्यादा दिखाई देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही domestic participation भारतीय बाजारों की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है।
क्या आने वाले समय में और बढ़ सकती है महंगाई?
बढ़ती तेल कीमतों के कारण inflation को लेकर चिंता लगातार बनी हुई है।
अगर crude oil लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो इसका असर:
- transportation costs
- manufacturing expenses
- consumer prices
पर पड़ सकता है।
इससे केंद्रीय बैंकों पर ब्याज दरें ऊंची रखने का दबाव भी बढ़ सकता है।
Global Markets से जुड़ चुका है Indian Market
Tuhin Kanta Pandey ने कहा कि आज के समय में बाजार पूरी तरह global developments से जुड़े हुए हैं।
उन्होंने कहा:
“बाजार में ups and downs बिल्कुल सामान्य हैं क्योंकि वैश्विक बाजार अब interconnected हो चुके हैं।”
यानी अब सिर्फ घरेलू खबरें ही नहीं, बल्कि अमेरिका, चीन, यूरोप और West Asia की घटनाएं भी भारतीय बाजार की दिशा तय करती हैं।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में निवेशकों को panic selling से बचना चाहिए।
Volatile market में निवेशकों को:
- लंबी अवधि का नजरिया रखना चाहिए
- मजबूत fundamentals वाली कंपनियों पर फोकस करना चाहिए
- portfolio diversification बनाए रखना चाहिए
- geopolitical headlines पर भावनात्मक फैसले नहीं लेने चाहिए
क्योंकि इतिहास बताता है कि बड़े संकटों के बाद बाजार अक्सर रिकवर भी करते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर भरोसा बरकरार
हालांकि वैश्विक चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन भारत की मजबूत आर्थिक growth, domestic demand और बढ़ती निवेश गतिविधियां अब भी सकारात्मक संकेत दे रही हैं।
कई वैश्विक एजेंसियां भारत को आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल मान रही हैं।
इसी वजह से long-term investors भारतीय बाजार को अब भी आकर्षक मानते हैं।
निष्कर्ष
Securities and Exchange Board of India के चेयरमैन Tuhin Kanta Pandey का बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता और डर का माहौल बना हुआ है।
West Asia संकट, बढ़ती तेल कीमतें और महंगाई की चिंताओं के बावजूद भारतीय बाजारों की resilience निवेशकों के लिए राहत की खबर मानी जा रही है।
अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि आने वाले हफ्तों में global tensions किस दिशा में जाते हैं और भारतीय बाजार इस चुनौतीपूर्ण दौर में खुद को कितनी मजबूती से संभाल पाते हैं।
