Vadh 2 Movie Review: जब नैतिक सवाल मजबूत हों लेकिन कहानी कमजोर पड़ जाए
साल 2022 में आई फिल्म ‘Vadh’ ने दर्शकों को एक गहरी नैतिक बहस में उलझाया था—क्या हर हत्या अपराध होती है, या कुछ हालात में वह न्याय का रूप ले सकती है? अब उसी विचार की स्पिरिचुअल सक्सेसर ‘Vadh 2’ एक बार फिर वही सवाल उठाती है, लेकिन इस बार कहानी उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाती, जहां तक वह शुरुआत में जाने का वादा करती है।
फिल्म में नीना गुप्ता और संजय मिश्रा एक बार फिर मुख्य भूमिकाओं में हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दोनों इस बार अपने पुराने किरदारों को दोहराते नहीं हैं। यही बदलाव फिल्म को नई दिशा देने का मौका देता है, हालांकि लेखन की कमजोरियां इस संभावनाओं भरी यात्रा को बीच में ही रोक देती हैं।
कहानी: जेल की दीवारों के बीच पनपता रिश्ता
‘Vadh 2’ की कहानी इस बार घरेलू ड्रामे से निकलकर जेल की सलाखों के भीतर पहुंचती है।
संजय मिश्रा का किरदार शंभुनाथ अब एक साधारण सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि शिवपुरी जेल में काम करने वाला कर्मचारी है।
वहीं नीना गुप्ता की मंजू एक आजीवन कारावास की सजा काट रही कैदी है, जिस पर दोहरे हत्याकांड का आरोप है।
इन दोनों के बीच रिश्ता किसी आम मुलाकात से नहीं, बल्कि जेल की दीवार में बनी एक दरार के जरिए पनपता है। यह प्रतीकात्मक जुड़ाव फिल्म की सबसे मजबूत परतों में से एक है—जहां आज़ादी और कैद के बीच सिर्फ एक पतली सी दीवार है।
मंजू, शंभुनाथ के जरिए जेल में चलने वाले अवैध कारोबार—खासतौर पर शराब—का हिस्सा बनती है, और यहीं से कहानी धीरे-धीरे गहराने लगती है।
कहानी में मोड़ और अपराध की शुरुआत
फिल्म का संतुलन तब बिगड़ता है जब कहानी में प्रवेश करता है
केशव (अक्षय डोगरा) – एक हिंसक और लालची अपराधी
नैना (योगिता बिहानी) – एक डरी-सहमी नई कैदी
इसके बाद आते हैं
नए जेलर प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा), जिनका किरदार जानबूझकर जातिवादी और सख्त दिखाया गया है
तेज-तर्रार पुलिस अधिकारी अतीत (अमित के सिंह), जो हत्या की जांच के लिए तैनात किया जाता है
इन सबके बीच एक हत्या होती है—और फिर वही पुराना सवाल उठता है:
अगर मारा गया इंसान मरने लायक था, तो क्या हत्यारा दोषी है?
थीम: नैतिकता, अपराध और न्याय
‘Vadh 2’ फिर से whydunit की राह पर चलती है—यह जानने की कोशिश कि हत्या क्यों हुई, न कि किसने की।
संजय मिश्रा का किरदार एक बार फिर इसे ‘हत्या’ नहीं बल्कि ‘वध’ कहता है, जो कहानी को नैतिक जटिलता देता है।
समस्या यह है कि जहां यह फिल्म दर्शक को सोचने पर मजबूर कर सकती थी, वहां लेखन जल्दबाजी में अपने पत्ते खोल देता है।
कुछ संकेत—जैसे एक अनावश्यक डीप फ्रीज़र—इतनी बार दिखाए जाते हैं कि रहस्य खत्म हो जाता है, और सस्पेंस बनने से पहले ही टूट जाता है।
लेखन और निर्देशन: मजबूत सेट-अप, कमजोर निष्पादन
फिल्म का शुरुआती माहौल, जेल की दुनिया और किरदारों का परिचय बेहद प्रभावशाली है।
लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है:
रहस्य पहले ही साफ हो जाता है
ट्विस्ट अनुमानित लगने लगते हैं
कुछ दृश्य जबरन खींचे हुए महसूस होते हैं
एक-दो प्लॉट पॉइंट ऐसे भी हैं, जो विदेशी मिस्ट्री नॉवेल्स से प्रेरित (या उधार लिए हुए) प्रतीत होते हैं।
अभिनय: कलाकारों ने पूरी कोशिश की
संजय मिश्रा – संयमित, गहरे और भरोसेमंद
नीना गुप्ता – कम संवादों में भी असरदार
कुमुद मिश्रा – नफरत पैदा करने में सफल
अक्षय डोगरा – खतरनाक लेकिन सीमित
योगिता बिहानी – भावनात्मक, लेकिन कम स्क्रीन टाइम
हालांकि एक-दो किरदारों को जरूरत से ज्यादा स्टाइलिश दिखाया गया है—जैसे एक पुलिस अफसर के फिजिक पर पूरा सीन—जो कहानी से ध्यान भटका देता है।
तकनीकी पक्ष
बैकग्राउंड स्कोर माहौल बनाता है
सिनेमैटोग्राफी जेल की घुटन को बखूबी दिखाती है
एडिटिंग थोड़ी टाइट हो सकती थी
फाइनल वर्डिक्ट: देखें या छोड़ें?
Vadh 2 एक ऐसी फिल्म है जो
अच्छे सवाल उठाती है
मजबूत कलाकारों के सहारे आगे बढ़ती है
लेकिन कमजोर लेखन के कारण असर खो देती है
अगर आपने पहली ‘Vadh’ देखी है और इस तरह की नैतिक बहस पसंद करते हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।
लेकिन अगर आप एक दमदार थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो निराशा हो सकती है।
